Wednesday, 26 December 2012

मांडूक्य उपनिषद 

1. ॐ यह अक्षर अविनाशी है। उसकी महिमा को प्रकट करने वाला यह विश्व - ब्रह्माण्ड है। भूत , भविष्य और वर्तमान तीनों कालों वाला यह संसार भी ॐ कार ही है। और तीनों कालों से अन्य जो भी तत्व है, वह भी ॐ कार ही है। 

2. यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मरूप ही है। वह और यह चार चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सुक्ष्म, कारण, एवं अव्यक्त रूपों में प्रभावी है। 

Monday, 24 December 2012

बृहद अरण्यक ( 4.3)
आत्मा क्या है?
प्राणों में चित्वृतियों के बीच स्थित विज्ञानमय  पुरुष है, वही सामान रूप से दोनों लोकों ( इहलोक और परलोक ) में संचारित होता है। वह पुरुष ( आत्मा ) स्वप्न के रूप में इहलोक ( देह और इन्द्रियों का समुच्य ) का अतिक्रमण करता है और मृत्यु के रूपों का भी उल्लंघन करता है। 
-( जीवन इहलोक में आत्मा के द्वारा देखे गए स्वप्न की ही भांति है। जो सत्य नहीं है, पर आत्मा द्वारा महसूस किया जाता है। )
वह ( ब्रह्म ) पूर्ण है। यह ( जगत ) भी पूर्ण है। पूर्ण ब्रह्म से ही पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत निकल लेने पर पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है। ॐ से संबोधित खं ( अनंत आकाश ) ब्रह्म है। आकाश सनातन है। जिस में वायु विचरण करता है वह आकाश ही खं है। यह ओमकार स्वरुप ब्रह्म ही वेद है। इस प्रकार ब्राह्मण जानते हैं। क्योंकि जो जान्ने योग्य है वह सब इस ओमकार रूप वेद से ही जाना जा सकता है।  ( बृहद अरण्यक 5.1.1 )

Thursday, 1 November 2012

विष्णु पुराण : अंश -1: अध्याय -2

जो पर ( प्रकृति ) से भी पर , परमश्रेष्ठ , अंतरात्मा में स्थित परमात्मा, रूप , वर्ण, नाम, और विशेषण आदि से  रहित  हैं। जिनमें जन्म , वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश इन छह विकारों का सर्वथा अभाव है।जिनको सर्वथा केवल है इतना ही कह सकते हैं। जिनके लिए यह प्रसिद्ध है की वो सर्वत्र हैं और सारा विश्व उनमें ही बसा हुआ है इसलिए ही विद्वान् जिनको वासुदेव कहते हैं वही नित्य , अजन्मा, अक्षय , अव्यय , एकरस और हेय गुणों के अभाव के कारण निर्मल परब्रह्म हैं। ( 10- 13)
वही इन सब व्यक्त ( कार्य ) और अव्यक्त ( कारण)   जगत के रूप से तथा इसके साक्षी पुरुष और महाकारण काल के रूप से स्थित हैं। (14)
परब्रह्म का प्रथम रूप पुरुष है अव्यक्त ( प्रकृति ) और व्यक्त (महदादि )  उसके अन्य रूप हैं और काल उसका परम रूप है। (15)
जो प्रधान , पुरुष , व्यक्त और काल इन चारों से परे हैं वही भगवान् विष्णु का परमपद है। (16)
प्रधान , पुरुष , व्यक्त और काल ये भगवान् विष्णु के रूप पृथक पृथक संसार की उत्पत्ति पालन और संहार के प्रकाश और उत्पादन में कारण हैं। (16)

Monday, 29 October 2012

भगवान् विष्णु का परमपद के चार भेद

विष्णु पुराण : प्रथम अंश: अध्याय 22: श्लोक 44-49

सब वस्तुओं का जो कारण होता है वही उसका साधन भी होता है, और जिस अपनी अभिमत वास्तु की सिद्धि की जाती है वही साध्य कहलाती है। 
मुक्ति की इच्छा वाले योगीजनों के लिए प्राणायाम आदि साधन हैं और परब्रह्म ही साध्य है, जहाँ से लौटना नहीं पड़ता।
जो योगी की मुक्ति का कारण है वह साध्नालंबन ज्ञान ही उस ब्रह्मभूत परमपद का प्रथम भेद है।
क्लेश बंधन से मुक्त होने के लिए योगाभ्यासी योगी का सध्यारूप जो ब्रह्म है उसका ज्ञान ही आलंबन विज्ञान नामक दूसरा भेद है।
इन दोनों साध्य साधनों का अभेदपूर्वक जो अद्वैतमय ज्ञान है वह तीसरा भेद है।
उक्त तीनो प्रकार के ज्ञान का निराकरण करने पर अनुभव हुए आत्मस्वरूप के समान ज्ञानस्वरूप भगवान् विष्णु का जो अनिर्वचनीय , आत्मबोध स्वरुप अलक्षण रूप है वह ब्रह्म ज्ञान चौथा भेद है।

Friday, 26 October 2012

श्री विष्णु पुराण : भगवान विष्णु का स्वरुप


प्रथम अंश : अध्याय 22 : श्लोक 68-74
इस जगत के निर्मल निर्गुण और निर्लेप आत्मा को अर्थात शुद्ध क्षेत्रज्ञ स्वरुप को श्री हरि कौस्तुभ मणि रूप से धारण करते हैं।
श्री अनंत ने प्रधान ( प्रकृति) को श्रीवत्स रूप से धारण किया है और बुद्धि श्रीमाधव की गदा रूप से स्थित है।
भूतों के कारण तामस अहंकार और इन्द्रियों के कारण राजस अहंकार इन दोनों को वे शंख और धनुष रूप से धारण करते हैं।
अपने वेग से पवन को भी पराजित करने वाला अत्यंत चंचल सात्विक अहंकार रूप मन श्री विष्णु भगवान् के कर कमलों में स्थित चक्र का रूप धारण करता है।
भगवान् गदाधर की जो पञ्चरूपा वैजन्ती माला है वह पंच्तान्मत्राओं और पंचभूतों का ही संघात है।
जो ज्ञान और कर्ममयी इन्द्रियां हैं उनको भगवान् जनार्दन बाण रूप से धारण करते हैं।
भगवान् अच्युत जो अत्यंत निर्मल खडग धारण करते हैं वह अविद्यामय कोष से आक्षादित विद्यामय ज्ञान ही है।
इस प्रकार पुरुष, प्रधान, बुद्धि , अहंकार, पञ्चमहाभूत, मन और इन्द्रियां , तथा विद्या और अविद्या सभी श्री भगवान् में आश्रित हैं।

Friday, 5 October 2012

YOG DARHSAN 2

11. पहले अनुभव किये गए विषयों का छिपा न रहना अर्थात प्रकट हो जाना स्मृति कहलाती है।

12. चित वृतियों का निरोध अभ्यास से होता है।

13. वहाँ चित की स्थिरता के लिए जो प्रयास किया जाता है उसे अभ्यास कहते हैं।

14. किन्तु वह अभ्यास लम्बे समय तक निरंतर और सत्कारपूर्वक सेवन किए जाने पर दृढ़ स्थिति वाला हो जाता है।

15. देखे हुए और सुने हुए विषयों में जो पूर्णरूपेण तृष्णा रहित है , ऐसे चित की अवस्था को वैराग्य कहते हैं।

16. पुरुष ( आत्मा ) के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में तृष्णा का पूरी तरह अभाव हो जाना परम वैराग्य कहलाता
है।

17. वितर्क , विचार , आनंद एवं अस्मिता इनके अनुगम सहयोग अथवा सम्बन्ध से सम्प्रज्ञात योग की स्थिति आती है।

18. जिसकी पूर्व अवस्था विराम प्रत्यय का अभ्यास है तथा जिसमें चित की स्थिति मात्र संस्काररूप ही शेष बचती है , वह असम्प्रज्ञात योग है।

19. असम्प्रज्ञात समाधि विदेह और प्रक्रितिलय वाले योगियों की होती है।